विकसित भारत 2047 के संवैधानिक रोडमैप में लाभार्थी, शरणार्थीऔर शोधार्थी की त्रिपक्षीय भूमिका:प्रोफेसर रिपु रंजन सिन्हा

भारत वर्तमान में अपने इतिहास के एक अत्यंत महत्वपूर्ण संक्रांति काल से गुजर रहा है, जहाँ वह अपनी स्वतंत्रता के शताब्दी वर्ष तक स्वयं को एक विकसित राष्ट्र के रूप में स्थापित करने के लिए ‘विकसित भारत 2047’ के विजन के साथ आगे बढ़ रहा है। इस महत्वाकांक्षी यात्रा के केंद्र में आर्थिक संवृद्धि, सामाजिक समावेशन, तकनीकी संप्रभुता और सुदृढ़ शासन जैसे मुख्य आयाम शामिल हैं।इसविकासात्मकविमर्शकोआकारदेनेवालेतीनप्रमुखवर्गभारतीयसामाजिकराजनीतिकऔरविधिकपरिदृश्यपरउभरेहैं: ‘लाभार्थी‘ (Labharthi), ‘शरणार्थी‘ (Sharnarthi), औरशोधार्थी‘ (Sodharthi)

यह प्रतिवेदन एशिया अफ्रीका डेवलपमेंट काउंसिल (ADCO) के महानिदेशक, वर्ल्ड एकेडमी ऑफ इंफॉर्मेटिक्स एंड मैनेजमेंट साइंसेज (WAIMS) के संस्थापक और नवोन्मेषी नीति विचारक प्रोफेसर रिपु रंजन सिन्हा के ‘रेड ग्रीन मूवमेंट 2030’ (RED GREEN Movement) और उनके द्वारा प्रतिपादित ज्ञान प्रबंधन सिद्धांतों के आलोक में तैयार किया गया है। प्रोफेसर सिन्हा का मूल सिद्धांत यह स्थापित करता है कि किसी भी विकासशील देश के लिएविकसितदर्जा प्राप्त करने हेतु देश के भीतर एक सुदृढ़ नवोन्मेषी संस्कृति का पोषण करना अनिवार्य है, जहाँ विज्ञान और तकनीक (Red) का संरेखण सतत विकास एवं मानवीय कल्याण (Green) के साथ सुनिश्चित किया जा सके। इस परिप्रेक्ष्य के अंतर्गत, यह विश्लेषण भारतीय संविधान की विभिन्न धाराओं के तहत इन तीनों वर्गों के बाह्य ‘संरचनात्मक प्रभाव’ (Effect) और नागरिकों की ‘मनोवैज्ञानिक एवं संवेदनात्मक प्रभावशीलता’ (Affect) का एक गहन अकादमिक मूल्यांकन प्रस्तुत करता है।


लाभार्थी और नवीन लोक-कल्याणवाद: सामाजिक सुरक्षा बनाम अधिकार-आधारित नागरिकता

भारतीय कल्याणकारी राज्य के पारंपरिक स्वरूप में पिछले एक दशक में व्यापक संरचनात्मक बदलाव आया है। पूर्ववर्ती अधिकारआधारित कल्याणकारी ढांचे (जैसे कि सूचना का अधिकार अधिनियम और महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम) के स्थान पर अब एक नवीन लोककल्याणवाद‘ (New Welfarism) यातकनीकीसंरक्षक राज्य‘ (Techno-Patrimonial State) का उदय हुआ है। यह नया प्रतिमान प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (DBT) और जैम (JAM – जनधन, आधार, मोबाइल) त्रिमूर्ति के डिजिटल Public Infrastructure (DPI) पर आधारित है।

सांख्यिकीय दृष्टि से, भारत सरकार द्वारा डीबीटी के माध्यम से दी जाने वाली सहायता में अभूतपूर्व विस्तार हुआ है। वित्तीय वर्ष 2013-14 की तुलना में डीबीटी के तहत हस्तांतरित वित्तीय आवंटन लगभग पच्चीस गुना बढ़कर वित्तीय वर्ष 2023-24 तक 2.1 trillion INR लगभग 21.5. Billion United States Dollar के स्तर को पार कर चुका है, जिससे वर्तमान में 1 अरब से अधिक नागरिक जुड़े हुए हैं। केंद्रीय बजट 2026-27 के विश्लेषण से पता चलता है कि कल्याणकारी व्यय अत्यंत विशाल है, जिसमें केवल खाद्य सब्सिडी के लिए 2.27 Lakh Caror आवंटित किए गए हैं। हालांकि, इस वित्तीय विशालता के बावजूद बजटीय विमर्श में पारंपरिक विधानों (जैसे राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम) का उल्लेख कम हुआ है, जो यह दर्शाता है कि अब कल्याणकारी नीतियों का संचालन कानूनी दावों के बजाय डिजिटल प्लेटफॉर्म-प्रवर्तित अनुपालन (Platform-enforced compliance) के माध्यम से किया जा रहा है।

इसतकनीकीसंरक्षकढांचेकाभारतीयनागरिकोंपरप्रभाव‘ (Effect) औरअसर‘ (Affect) अत्यंत जटिल है:

  • संरचनात्मक प्रभाव (Effect): ‘पीएम आवास योजना’ के अंतर्गत मैदानी क्षेत्रों में 1.2 Lakh INR और पहाड़ी क्षेत्रों में की 1.3 Lakh Carod प्रत्यक्ष वित्तीय सहायता से करोड़ों बेघर परिवारों को पक्के मकान उपलब्ध कराए गए हैं। इसके साथ ही, ‘लाखपति दीदी’ जैसी योजनाओं के माध्यम से स्वयं सहायता समूहों (SHGs) की 2 करोड़ महिलाओं को ड्रोन संचालन और सूक्ष्म-उद्यमों का प्रशिक्षण देकर उनकी प्रति वर्ष आय कम से कम तक पहुँचाने का लक्ष्य रखा गया है। इन पहलों ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था में परिसंपत्ति सृजन और गरीबी उन्मूलन में उल्लेखनीय भूमिका निभाई है।
  • मनोवैज्ञानिक एवं संवेदनात्मक असर (Affect): समाजशास्त्रियों का मानना है कि यह व्यवस्था नागरिकों को अधिकारों से लैससक्रिय दावाकर्ता‘ (Active Claim-makers) के बजाय राज्य और राजनीतिक नेतृत्व की अनुकंपा पर निर्भरनिष्क्रिय प्राप्तकर्ता‘ (Passive Recipients) के रूप में ढालती है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 39(a) (सभी के लिए आजीविका के पर्याप्त साधन), अनुच्छेद 39(d) (समान कार्य के लिए समान वेतन), और अनुच्छेद 42 (मानवीय कार्यदशाओं और मातृत्व राहत) के तहत जो कल्याणकारी प्रावधान राज्य के विधिक दायित्व थे, वे अब भावनात्मक रूप से ‘पारिवारिक संरक्षण’ (जैसे महाराष्ट्र की ‘लाड़ली बहन’ या ‘भाभी-नणद’ योजनाओं का भाई-बहन या पारिवारिक रिश्तों के रूप में राजनीतिकरण) के रूप में पुनर्गठित हो रहे हैं। इससे नागरिकों के भीतर विधिक अधिकारों के प्रति संवेदनशीलता कमजोर होती है और वे स्वयं को अधिकारों से युक्तनागरिकके बजाय राज्य केविषय‘ (Subject) के रूप में देखने लगते हैं।

विकसित भारत 2047 के वंचित को वरीयताके सिद्धांत के तहत लाभार्थी वर्ग को केवल उपभोग-आधारित सहायता देने के बजाय उत्पादक श्रम और उद्यमशीलता की ओर मोड़ना आवश्यक है, ताकि वे देश की  की आर्थिक यात्रा के वास्तविक चालक बन सकें।


शरणार्थी और संवैधानिक संरक्षण: संप्रभुता, सुरक्षा और मानवीय न्यायशास्त्र

भारत का भूराजनीतिक स्थान और ऐतिहासिक विरासत इसे दक्षिण एशिया में शरणार्थियों के लिए एक प्रमुख गंतव्य बनाती है। वर्तमान में भारत में विभिन्न पड़ोसी देशों से आए लगभग 8.8 लाख से अधिक शरणार्थी और शरण चाहने वाले लोग रह रहे हैं। विडंबना यह है कि भारत ने अभी तक 1951 के संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी कन्वेंशन या इसके 1967 के प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं। देश में कोई विशिष्ट घरेलू शरणार्थी कानून भी नहीं है। वर्तमान में शरणार्थियों को मुख्य रूप से ‘विदेशी अधिनियम, 1946’ के तहत विदेशी नागरिकों के रूप में ही नियमित किया जाता है। हालांकि, हाल के नीतिगत प्रयासों के तहत पुराने औपनिवेशिक कानूनों जैसे पासपोर्ट (प्रवेश) अधिनियम 1920, विदेशी पंजीकरण अधिनियम 1939, विदेशी अधिनियम 1946 और आप्रवासन (वाहक दायित्व) अधिनियम 2000 को आधुनिक संहिताओं से प्रतिस्थापित करने की प्रक्रिया चल रही है।

इस संदर्भ में, शरणार्थियों की उपस्थिति का भारतीय नागरिकों और विधिक प्रणाली पर निम्नलिखित द्विआयामी प्रभाव पड़ता है:

  • संरचनात्मक प्रभाव (Effect): शरणार्थियों के बड़े पैमाने पर आगमन से सीमावर्ती राज्यों की जनसांख्यिकी प्रभावित होती है और स्थानीय नागरिकों के लिए उपलब्ध सार्वजनिक संसाधनों (जैसे पेयजल, स्वास्थ्य सेवाएं, राशन और प्राथमिक रोजगार) पर गंभीर दबाव पड़ता है। उदाहरण के लिए, तमिलनाडु के शिविरों में रह रहे श्रीलंकाई तमिल शरणार्थियों को राज्य सरकार द्वारा न केवल रियायती राशन (सस्ते गल्ले की दुकानों के माध्यम से अत्यंत कम दरों पर चावल) प्रदान किया जाता है, बल्कि उन्हें स्थानीय स्तर पर रोजगार की अनुमति और प्रत्यक्ष नकद सहायता भी दी जाती है। हालांकि, राष्ट्रीय सुरक्षा और वित्तीय विसंगतियों को रोकने के लिए उनके बैंक खातों को केवल स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से संचालित करने की अनुमति दी गई है ताकि किसी भी प्रकार के अवैध विदेशी धन के प्रवाह (RBI विनियमों के उल्लंघन) को रोका जा सके।
  • मनोवैज्ञानिक एवं संवेदनात्मक असर (Affect): स्थानीय नागरिकों में शरणार्थियों के प्रति संकीर्ण आर्थिक प्रतिस्पर्धा और जनसांख्यिकीय असुरक्षा की भावना उत्पन्न होती है। हाल ही में न्यायपालिका की टिप्पणियों (जैसे कि उच्चतम न्यायालय की क्या भारत दुनिया भर के शरणार्थियों की मेजबानी करने के लिए एक धर्मशाला है?”) ने देश के नागरिकों के बीच बढ़ती जनसांख्यिकीय और सुरक्षा संबंधी चिंताओं को प्रतिबिंबित किया है। इसके विपरीत, शरणार्थियों की अनिश्चित विधिक स्थिति उनके भीतर भी निरंतर निर्वासन और अलगाव का गहरा मनोवैज्ञानिक भय बनाए रखती है।

संवैधानिकन्यायशास्त्रकेअंतर्गत, भारतीय उच्चतर न्यायपालिका ने शरणार्थियों के अधिकारों के संरक्षण में महत्वपूर्ण मानवीय दृष्टिकोण अपनाया है। सर्वोच्च न्यायालय ने लुईस डी रेड्ट बनाम भारतसंघ(1991) और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग बनाम अरुणाचल प्रदेश राज्य(चकमा शरणार्थियों का मामला ) में यह स्पष्ट किया है कि संविधान के अनुच्छेद 14 (समता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार) के तहत मिलने वाले विधिक संरक्षण देश के नागरिकों के साथ-साथ भारत की सीमा में रहने वाले सभी गैर-नागरिकों और शरणार्थियों पर भी समान रूप से लागू होते हैं। इसके अतिरिक्त, रोहिंग्या मामले (फजल अब्दाली बनाम भारत संघ) में न्यायालय ने माना कि यद्यपि शरणार्थियों को भारत में बसने का कोई मौलिक अधिकार नहीं है, फिरभी अनुच्छेद 21 के तहत उन्हें अमानवीयया यातना पूर्ण स्थितियों वाले देशों मेंजबरन वापस भेजने (Non-Refoulement) के विरुद्ध संरक्षण प्राप्त है।विकसित भारत 2047 के अंतर्गत भारत को अपनी संप्रभुता, राष्ट्रीय सुरक्षा और मानवीय दृष्टिकोण के बीच संतुलन साधने के लिए एक सुदृढ़ राष्ट्रीय शरणार्थी नीति कीआवश्यकता है।

शोधार्थी और ‘जय अनुसंधान’: वैज्ञानिक दृष्टिकोण और नवोन्मेषी राष्ट्र-निर्माण

माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत के भविष्य की नींव रखने के लिए ‘जय जवान, Jai किसान, जय विज्ञान’ के ऐतिहासिक नारे में ‘जय अनुसंधान’ (Jai Anusandhan) को जोड़कर शोधार्थियों को राष्ट्र-निर्माण की अग्रिम पंक्ति में खड़ा कर दिया है। प्रोफेसर रिपु रंजन सिन्हा के अनुसार, नवोन्मेषी संस्कृति के बिना कोई भी देश केवल आर्थिक प्रगति के बल पर विकसितहोने का गौरव प्राप्त नहीं कर सकता। प्रोफेसर सिन्हा की पुस्तक डोंट किल इनोवेशन और उनका रेड ग्रीन मूवमेंट 2030′ बौद्धिक स्वतंत्रता, तर्कशीलता और व्यावहारिक विज्ञान के एकीकरण की वकालत करते हैं।

संवैधानिक रूप से, ‘शोधार्थी‘ (Sodharthi) वर्ग की भूमिका सीधे तौर पर संविधान के भाग IV-A में उल्लिखित नागरिकों के मौलिक कर्तव्यों के अनुच्छेद 51A(h) से जुड़ी हुई है, जो हर नागरिक को वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानववाद, और ज्ञानार्जन तथा सुधार की भावनाविकसित करने का निर्देश देता है।इस संवैधानिक और नीतिगत संरेखण के तहत शोधार्थियों की भूमिका का नागरिकों पर गहरा प्रभाव पड़ता है:

  • संरचनात्मक प्रभाव (Effect): शोधार्थियों के माध्यम से ही भारत वैश्विक नवाचार सूचकांक (GII) में वर्ष 2015 के 81वें स्थान से लंबी छलांग लगाकर वर्ष 2023 तक 40वें स्थान पर पहुँच सका है। इसके अतिरिक्त, देश में गहरे-तकनीकी (Deep-Tech) स्टार्टअप्स की संख्या बढ़कर 1.2 लाख से अधिक हो गई है, जिसमें 100 से अधिक यूनिकॉर्न शामिल हैं। शोधार्थियों के इस वैज्ञानिक अनुसंधान को संस्थागत बल देने के लिए संसद के अधिनियम द्वारा ‘अनुसंधान राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन’ (ANRF) अधिनियम, 2023 पारित किया गया है। यह संस्था वर्ष 2023 से 2028 के बीच का कोष जुटाकर देश के विश्वविद्यालयों में अनुसंधान को उद्योग और सरकार के साथ जोड़ेगी। इसके समानांतर, केंद्रीय कैबिनेट ने के वित्तीय परिव्यय के साथ ‘वन नेशन वन सब्सक्रिप्शन’ (ONOS) योजना को मंजूरी दी है, जिससे देश के 6,300 से अधिक उच्च शिक्षण संस्थानों के लगभग 1.8 करोड़ शोधार्थियों और छात्रों को अंतर्राष्ट्रीय उच्च-प्रभाव वाले वैज्ञानिक जर्नल्स तक डिजिटल और निःशुल्क पहुँच प्राप्त होगी।
  • मनोवैज्ञानिक एवं संवेदनात्मक असर (Affect): शोधार्थियों का कार्य नागरिकों में अतार्किक विश्वासों, अंधविश्वासों और दुष्प्रचार (Misinformation) के विरुद्ध एक बौद्धिक ढाल के रूप में कार्य करता है। विज्ञान के प्रयोगों और तर्कसंगत सोच को बढ़ावा देकर शोधार्थी समाज में एक ऐसी बौद्धिक स्वतंत्रता और बहुलवाद (Pluralism) का निर्माण करते हैं, जो किसी भी जीवंत लोकतंत्र के फलने-फूलने के लिए आवश्यक है। जब देश के युवा शोधार्थी चंद्रयान, कोविड वैक्सीन, क्वांटम मिशन और जैव-विनिर्माण (BioE3 नीति) जैसे क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता हासिल करते हैं, तो यह संपूर्ण राष्ट्र के सामूहिक आत्मविश्वास और गौरव (आत्म-बोध) को बढ़ाता है।

हालांकि, इस क्षेत्र में कई बौद्धिक और प्रशासनिक चुनौतियाँ भी विद्यमान हैं। प्रोफेसर सिन्हा और अन्य वैज्ञानिकों का मानना है कि केवल वैज्ञानिक साक्षरता बढ़ाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि शोधार्थियों को प्रशासनिक जटिलताओं, नौकरशाही के अवरोधों और शोध अनुदानों में होने वाली कटौती से मुक्त करना होगा। अनुसंधान को केवल कुछ संभ्रांत संस्थानों तक सीमित रखने के बजाय ‘हब-एंड-स्पोक’ प्रारूप (Hub-and-Spoke model) में छोटे शहरों और राज्य विश्वविद्यालयों के साथ जोड़ना होगा, जैसा कि एएनआरएफ की रणनीतियों में प्रस्तावित है।

संवादात्मक विश्लेषण एवं सांख्यिकीय साक्ष्य

विकसित भारत 2047 के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए इन तीनों सामाजिक वर्गों की संवैधानिक और संरचनात्मक स्थिति को स्पष्ट करने हेतु निम्नलिखित तालिकाओं के माध्यम से तुलनात्मक विवरण प्रस्तुत किया गया है।

तालिका 1: विकसित भारत 2047 के चार स्तंभों के सापेक्ष लाभार्थी, शरणार्थी और शोधार्थी का संरेखण

विकसित भारत के स्तंभलाभार्थी वर्ग (Labharthi)शरणार्थी वर्ग (Sharnarthi)शोधार्थी वर्ग (Sodharthi)
गरीब (Garib)प्रत्यक्ष वित्तीय अंतरण और कल्याणकारी योजनाओं (पीएम आवास, डीबीटी) के माध्यम से बहुआयामी गरीबी रेखा से बाहर निकालना।शरणार्थी बस्तियों में बुनियादी मानवीय राहत (राशन, पेयजल) प्रदान कर स्थानीय संसाधनों पर पड़ने वाले दबाव को प्रबंधित करना।स्वदेशी कृषि प्रौद्योगिकियों (जैव-उर्वरक, मृदा संवर्धन) द्वारा कृषि लागत को कम करके ग्रामीण गरीबी का उन्मूलन।
युवा (Yuva)कौशल भारत और मुद्रा ऋणों के माध्यम से स्वरोजगार के अवसर उपलब्ध कराना और ‘रेवड़ी’ संस्कृति से मुक्त करना।शरणार्थी युवाओं के लिए शिक्षा और अनौपचारिक श्रम बाजारों में कौशल उन्नयन की न्यायसंगत सीमाओं का निर्धारण।एएनआरएफ (ANRF) और पीएम ईसीआरजी (PM ECRG) फेलोशिप के माध्यम से वैज्ञानिक अनुसंधान और डीप-टेक स्टार्टअप्स का नेतृत्व प्रदान करना।
महिला (Mahilayen)लाखपति दीदी और लाड़ली बहन योजनाओं के माध्यम से सीधे बैंक खातों में वित्तीय अधिकार प्रदान कर लैंगिक न्याय सुनिश्चित करना।शिविरों में रह रही पीड़ित महिला शरणार्थियों को सखी केंद्रों और मातृत्व वित्तीय सहायता के माध्यम से विशेष मानवीय संरक्षण देना।उच्च शिक्षा और वैज्ञानिक अनुसंधान (विज्ञान, तकनीक, इंजीनियरिंग, गणित – STEM) के क्षेत्रों में महिला शोधार्थियों की भागीदारी बढ़ाना।
किसान (Annadata)पीएम-किसान (PM-KISAN) और फसल बीमा योजनाओं के माध्यम से सीधे बैंक खातों में कृषि सहायता राशि का पारदर्शी हस्तांतरण।कृषि वानिकी और कृषि-बागवानी गतिविधियों में सहायक श्रमिकों के रूप में शरणार्थी श्रम बल का सीमित और विधिक नियमन।एग्रो-इंफॉर्मेटिक्स, नैनो-प्रौद्योगिकी और जैव-फोर्टिफाइड (Biofortified) फसलों के अनुसंधान द्वारा खाद्य सुरक्षा से पोषण सुरक्षा की ओर संक्रमण सुनिश्चित करना।

तालिका 2: लाभार्थी, शरणार्थी और शोधार्थी का संवैधानिक एवं मनोवैज्ञानिक तुलनात्मक मैट्रिक्स

विश्लेषण के पैरामीटरलाभार्थी (Labharthi Varg)शरणार्थी (Sharnarthi)शोधार्थी (Sodharthi)
मुख्य संवैधानिक प्रावधानभाग IV (DPSP) – अनुच्छेद 39(a), 39(d), 42भाग III (मौलिक अधिकार) – अनुच्छेद 14, 21, 51(c), 253भाग IV-A (मौलिक कर्तव्य) – अनुच्छेद 51A(h)
मुख्य विधिक/नीतिगत माध्यमडीबीटी (DBT) प्लेटफॉर्म, जैम (JAM) ट्रिनिटी, पीएम आवास योजनाविदेशी अधिनियम 1946, सीमा विधिक नियमन, गैर-प्रत्यावर्तन सिद्धांतएएनआरएफ (ANRF) अधिनियम 2023, वन नेशन वन सब्सक्रिप्शन (ONOS), राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020
नागरिकों पर भौतिक प्रभाव (Effect)प्रत्यक्ष उपभोग और बुनियादी जीवन स्तर में गुणात्मक सुधार, क्रय शक्ति में तात्कालिक वृद्धिसीमित सार्वजनिक अवसंरचना (स्वास्थ्य, शिक्षा) पर संसाधनों का विभाजन और सुरक्षा संबंधी चुनौतियाँवैज्ञानिक नवाचार, राष्ट्रीय बौद्धिक संपदा (IPR) का सृजन और डीप-टेक स्टार्टअप्स के माध्यम से रोजगार के नए अवसरों का जन्म
नागरिकों पर मनोवैज्ञानिक असर (Affect)अधिकार-चेतना का ह्रास; नागरिकों में स्वयं को विधिक दावाकर्ता के बजाय राज्य की दया पर निर्भर ‘लाभार्थी’ मानने की प्रवृत्ति।स्थानीय जनसांख्यिकीय बदलावों के प्रति असुरक्षा की भावना; राष्ट्रीय सीमाओं और पहचान को लेकर नागरिकों में चिंता।समाज में तर्कशीलता, बौद्धिक स्वतंत्रता और वैज्ञानिक सोच का प्रसार; राष्ट्रीय गौरव और वैज्ञानिक संप्रभुता का सुदृढ़ीकरण।
विकसित भारत 2047 के लिए मुख्य नीतिगत लक्ष्य अर्थव्यवस्था में लाभार्थियों को आत्मनिर्भर कर उत्पादक करदाता बनाना।राष्ट्रीय संप्रभुता और सुरक्षा की सीमाओं में ‘वसुधैव कुटुंबकम’ के मानवीय मूल्यों का विधिक संस्थागतकरण।सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में अनुसंधान एवं विकास (R&D) निवेश को बढ़ाना और भारत को वैश्विक ज्ञान अर्थव्यवस्था बनाना।


भारतीय समाज में लाभार्थी, शरणार्थी और शोधार्थी का यह त्रिपक्षीय वर्गीकरण केवल सामाजिक श्रेणियों का विभाजन नहीं है, बल्कि यह विकसित भारत 2047 के मार्ग मेंआनेवाली नीतिगत, विधिक और दार्शनिक चुनौतियों का दर्पण है। प्रोफेसर रिपु रंजन सिन्हा के नवोन्मेषी सिद्धांतों और उनके ‘रेड ग्रीन मूवमेंट’ के प्रकाश में, इस त्रिपक्षीय प्रभाव को संतुलित करने के लिए निम्नलिखित रणनीतिक कदम उठाने की आवश्यकता है:

  • कल्याणकारी योजनाओं का संरचनात्मक रूपांतरण (लाभार्थी से आत्मनिर्भर नागरिक): प्रत्यक्ष वित्तीय सहायता और सब्सिडी के वितरण को एक निश्चित समय सीमा के भीतर कौशल संवर्धन से जोड़ा जाना चाहिए। महिलाओं को केवल ‘लाड़ली बहन’ या पारिवारिक संबंधों की सुरक्षा देने के बजाय उन्हें कानूनी रूप से सशक्त श्रमिकऔरलखपति दीदी जैसे उद्यमी के रूप में परिवर्तित किया जाना चाहिए। यह दृष्टिकोण उन्हें निष्क्रिय लाभार्थी से सक्रिय आर्थिक नागरिक में बदलेगा, जो अंततः देश के के लक्ष्य को साकार करेगा।
  • एक व्यापक और संतुलित राष्ट्रीय शरणार्थी कानून का निर्माण (शरणार्थी नियमन): भारत को अपनी सीमाओं की सुरक्षा और जनसांख्यिकीय अखंडता को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए एक विशिष्ट घरेलू कानून का निर्माण करना चाहिए। यह कानून सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अनुच्छेद 21 के तहत दिए गए प्राण और दैहिक स्वतंत्रता के मानवीय संरक्षण तथा स्थानीय नागरिकों के आर्थिक संसाधनों के संरक्षण के बीच एक सुदृढ़ विधिक संतुलन स्थापित करे6
  • अनुसंधान के लोकतंत्रीकरण और वैज्ञानिक चेतना का प्रसार (शोधार्थी सुदृढ़ीकरण): ‘जय अनुसंधान’ के नारे को वास्तविक धरातल पर उतारने के लिए एएनआरएफ (ANRF) के माध्यम से उद्योग और शिक्षण संस्थानों के बीच की खाई को पाटना होगा। वन नेशन वन सब्सक्रिप्शनजैसी योजनाओं को देश के टियर-2 और टियर-3 शहरों के सभी राज्य विश्वविद्यालयों और डिग्री कॉलेजों तक प्रभावी रूप से पहुँचाना होगा, ताकि शोध की क्षमता का लोकतंत्रीकरण हो सके। इसके साथ ही, समाज में अनुच्छेद 51A(h) के अनुरूप वैज्ञानिक दृष्टिकोण का पोषण करने के लिए स्वतंत्र बौद्धिक चिंतन और प्रश्न पूछने की संस्कृति को विद्यालयों से लेकर उच्च शिक्षण संस्थानों तक अनिवार्य रूप से शामिल करना होगा।

सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयासके समेकित महामंत्र के माध्यम से ही भारत इन तीनों वर्गों केप्रभावशीलता कोसंवैधानिक मर्यादाओंकेअनुकूल निर्देशित करसकता है।जब तक भारत का लाभार्थी आत्मनिर्भर नहींबनता, शरणार्थी मुद्दा विधिक रूप से अनुशासित नहीं होता, और शोधार्थी वर्ग को नवोन्मेष की पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त नहीं होती, तबतक विकसित भारत का स्वप्न अधूरा रहेगा।प्रोफेसर रिपु रंजन सिन्हा के सिद्धांतों के अनुसार, इन तीनों मोर्चों पर एक समन्वित और तार्किक नीतिगत दृष्टिकोण ही भारत को वर्ष 2047 तक विश्वगुरुऔर एक आत्मनिर्भर वैज्ञानिक महाशक्ति के रूप में स्थापित करेगा।

Author: Office of Prof. Ripu Ranjan Sinha

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