भारतीय इतिहास के पन्नों में शासन कला, कूटनीति और जन प्रबंधन का एक लंबा और जटिल वृत्तांत रहा है। 1947 से पहले की रियासतों के सामंती ढांचे से लेकर आधुनिक भारत के ‘अमृत काल’ तक की यात्रा, न केवल राजनीतिक परिवर्तन की कहानी है, बल्कि यह करोड़ों भारतीयों के सामाजिक-आर्थिक उत्थान का एक जीवंत दस्तावेज है। इस विश्लेषण का मुख्य उद्देश्य प्रोफेसर रिपु रंजन सिन्हा के विचारों के आलोक में यह समझना है कि कैसे भारत ने अपनी ऐतिहासिक विफलताओं से सीख लेकर ‘विकसित भारत 2047’ के संकल्प को आकार दिया है। प्रोफेसर सिन्हा का दर्शन, जो “नवाचार करें, भारत का विकास करें और सतत भारत का निर्माण करें” (Innovate India, Develop India, and Sustainable India) के सिद्धांत पर आधारित है, आज की राष्ट्रीय नीतियों के लिए एक महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश प्रदान करता है।
1947 से पहले का भारत एक विभाजित प्रशासनिक ढांचे के अंतर्गत था, जिसमें लगभग एक-तिहाई हिस्सा रियासतों के अधीन था जो ब्रिटिश क्राउन के साथ संधियों और संविदाओं से बंधे थे । इस कालखंड के राजाओं, नवाबों और उनके कूटनीतिज्ञों का विश्लेषण करने पर यह स्पष्ट होता है कि उनके जन प्रबंधन में संरचनात्मक दोष थे, जिन्होंने भविष्य के सामाजिक संकटों की नींव रखी।
अठारहवीं और उन्नीसवीं शताब्दी के दौरान, रियासतों में शासन का स्वरूप ‘पारंपरिक नातेदारी-आधारित’ (Kinship-based) प्रशासन से बदलकर एक ‘आधुनिक पेशेवर नौकरशाही’ की ओर झुकने लगा था 2। हालांकि इसे आधुनिकता का नाम दिया गया, लेकिन वास्तविकता यह थी कि यह ब्रिटिश “सर्वोच्च शक्ति” (Paramount Power) के हितों को साधने का एक उपकरण मात्र था। अलवर जैसी रियासतों में, शासकों ने अपने ही रिश्तेदारों (जागीरदारों) को सत्ता के लिए चुनौती माना और उनके प्रभाव को कम करने के लिए “दिल्ली के दीवानों” जैसे बाहरी पेशेवर नौकरशाहों को नियुक्त किया ।
इन नौकरशाहों को “ब्यूरोक्रेटिक हियर्ड गन” (Bureaucratic Hired Gun) के रूप में देखा गया, जिनकी स्थानीय जनता के प्रति कोई वफादारी नहीं थी 2। इस प्रक्रिया ने शासकों को अपनी ही प्रजा से अलग-थलग कर दिया, जिससे प्रशासन और जनता के बीच एक गहरी खाई पैदा हो गई। यह कूटनीतिक विफलता का चरम था, जहाँ शासक अपनी स्वायत्तता बचाने के लिए ब्रिटिश अधिकारियों के प्रति तो जवाबदेह थे, लेकिन अपनी प्रजा की खुशहाली के प्रति उदासीन ।
स्वतंत्रता के समय, कई रियासतों के शासकों ने अपनी निरंकुश सत्ता को बनाए रखने के लिए जटिल कूटनीतिक जाल बुना। हैदराबाद के सातवें निजाम, मीर उस्मान अली खान का उदाहरण इस संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण है। निजाम ने अपनी ‘स्वतंत्र संप्रभु राज्य’ की आकांक्षाओं को पालने के लिए रजाकारों जैसी मिलिशिया का समर्थन किया, जो अंततः सांप्रदायिक विद्वेष और शासन की विफलता का कारण बना । निजाम की कूटनीति इस भ्रम पर आधारित थी कि वह अपनी हिंदू बहुसंख्यक जनता की राष्ट्रवादी आकांक्षाओं को अनदेखा कर सकते हैं ।
इसी प्रकार, दक्कन की आठ रियासतों ने 1947 में एक साथ मिलकर एक ‘यूनिटरी सरकार’ बनाने की योजना बनाई, ताकि वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और ब्रिटिश शासन दोनों से अपनी रक्षा कर सकें । इस योजना की सबसे बड़ी विफलता यह थी कि इसमें जनता की राय का कोई स्थान नहीं था। महात्मा गांधी ने इस योजना की आलोचना करते हुए कहा था कि यदि शासक वास्तव में अपनी जनता का हित चाहते हैं, तो उन्हें सबसे पहले उन्हें पूर्ण स्वतंत्रता और ‘प्रिवी पर्स’ पर नियंत्रण देना चाहिए ।
| रियासत/क्षेत्र | शासन का स्वरूप | विफलता का मुख्य कारण | जनता पर प्रभाव |
| अलवर (राजपुताना) | पेशेवर नौकरशाही का आयात | शासक का स्थानीय समुदायों से अलगाव | प्रशासन का पतन और विद्रोह |
| हैदराबाद | रजाकारों समर्थित निरंकुशता | लोकतांत्रिक आकांक्षाओं की अनदेखी | सांप्रदायिक हिंसा और अशांति |
| दक्कन की रियासतें | कूटनीतिक परिसंघ | जनता की भागीदारी का अभाव | राजनीतिक अस्थिरता |
| ब्रिटिश भारत | औपनिवेशिक शोषण | अत्यधिक कर और आर्थिक दोहन | व्यापक गरीबी और अकाल |
सामंती और औपनिवेशिक शासन के संयुक्त प्रभाव ने भारतीय समाज के चार प्रमुख स्तंभों—महिलाओं, किसानों, युवाओं और गरीबों—को गहरे संकट में धकेल दिया था।
मध्यकालीन भारत से शुरू होकर स्वतंत्रता तक, महिलाओं की स्थिति में निरंतर गिरावट आई। बाहरी आक्रमणों और रियासतों की सामंती व्यवस्था ने महिलाओं पर कठोर सामाजिक बंधन थोप दिए । पर्दा प्रथा, घूँघट प्रथा और विधवाओं की निम्न स्थिति उस काल की कड़वी सच्चाई थी। अठारहवीं शताब्दी में दास प्रथा भी प्रचलित थी, जिससे महिलाएं और बच्चे सबसे अधिक प्रभावित थे ।
आर्थिक रूप से, महिलाएं एक “अदृश्य शक्ति” थीं। 1940 के दशक के अकाल और युद्ध के दौरान, बंगाल जैसी जगहों पर महिलाएं भारी संकट का सामना कर रही थीं। हालांकि वे औपचारिक और अनौपचारिक दोनों क्षेत्रों में सक्रिय थीं, लेकिन उनके श्रम को औपनिवेशिक राज्य और समाज द्वारा बहुत कम आंका गया । कुपोषण की स्थिति यह थी कि महिलाएं परिवार में ‘सबसे अंत में और सबसे कम’ खाती थीं, जिससे मातृ मृत्यु दर में अत्यधिक वृद्धि हुई ।
कृषि क्षेत्र पूर्व-1947 में तकनीकी रूप से पिछड़ा हुआ और शोषणकारी राजस्व नीतियों से त्रस्त था । राजस्थान की रियासतों में किसानों पर 37 से भी अधिक प्रकार के ‘लाग-बाग’ (अतिरिक्त कर) आरोपित थे । बीकानेर और बूंदी जैसे क्षेत्रों में, अकाल पड़ने के बावजूद भी शासकों ने कर वसूली के प्रयास किए, जिससे किसानों ने ‘बिजोलिया’ और ‘बरड’ जैसे ऐतिहासिक आंदोलनों की शुरुआत की ।
ज़मींदारी प्रथा ने किसानों को अपनी ही भूमि पर किराएदार बना दिया था। कमला मार्कंडेय के उपन्यासों में चित्रित ‘नेक्टर इन अ सीव’ जैसी कृतियाँ उस काल के गरीब किसानों की भूख और मानवीय गिरावट का सजीव चित्रण करती हैं । भूमिहीन कृषि श्रमिकों की स्थिति और भी बदतर थी, जिनका जीवन केवल ज़मींदारों की दया पर निर्भर था।
स्वतंत्रता पूर्व भारत में शिक्षा केवल उच्च जातियों और समृद्ध वर्गों तक सीमित थी । विज्ञान और तकनीकी शिक्षा की उपेक्षा की गई, जिससे समाज एक ‘रचनात्मक जड़ता’ में फंस गया। युवाओं के पास न तो कौशल विकास के अवसर थे और न ही औद्योगिक रोजगार के साधन। गरीबी एक ‘निरंकुश शासक’ की तरह थी, जिसने लोगों को भूख, बेरोजगारी और अपमान के दलदल में धकेल दिया था ।
स्वतंत्रता के पश्चात भारत-1947-2047
1947 के बाद, भारत ने एक खंडित राष्ट्र को जोड़ने और उसके सामाजिक-आर्थिक उत्थान की एक नई यात्रा शुरू की। विभिन्न प्रधानमंत्रियों ने अपने-अपने कार्यकाल में महिलाओं, किसानों, युवाओं और गरीबों के लिए कई ऐतिहासिक कदम उठाए।
जवाहरलाल नेहरू ने
- एक ‘कल्याणकारी राज्य’ (Welfare State) की परिकल्पना की, जहाँ विज्ञान और तकनीक विकास के मुख्य चालक हों । उन्होंने योजना आयोग की स्थापना की और पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से विकास को गति दी ।
- नेहरू ने आईआईटी (IITs) और यूजीसी (UGC) जैसे संस्थानों की स्थापना की, ताकि देश का युवा वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर सके ।
- नेहरू-महालनोबिस मॉडल ने भारी उद्योगों और सार्वजनिक क्षेत्र को प्राथमिकता दी, ताकि देश आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो सके ।
- नेहरू ने विधवाओं, महिलाओं और बच्चों के कल्याण को शीर्ष प्राथमिकता दी और लैंगिक समानता की वकालत की ।
लाल बहादुर शास्त्री और इंदिरा गांधी: आत्मनिर्भरता और गरीबी उन्मूलन
लाल बहादुर शास्त्री का
“जय जवान जय किसान” का नारा उस समय की आवश्यकता थी, जिसने देश को खाद्यान्न संकट से उबारने के लिए प्रेरित किया । उनके बाद, इंदिरा गांधी ने “गरीबी हटाओ” के मिशन को अपनी राजनीति का केंद्र बनाया।
इंदिरा गांधी ने
- उन्नत बीजों, उर्वरकों और सिंचाई की सुविधाओं को बढ़ावा देकर भारत को खाद्यान्न में आत्मनिर्भर बनाया ।
- 1969 में बैंकों के राष्ट्रीयकरण से कृषि और लघु उद्योगों को ऋण मिलना आसान हुआ, जिससे आर्थिक न्याय की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया गया ।
- सत्तर के दशक की शुरुआत में किए गए भूमि सुधारों ने लाखों भूमिहीन परिवारों को जमीन का मालिकाना हक दिलाया ।
राजीव गांधी से मनमोहन सिंह तक: तकनीकी क्रांति और उदारीकरण
राजीव गांधी ने
पंचायती राज संस्थाओं को बढ़ावा दिया और ‘जवाहर रोजगार योजना’ के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर पैदा किए। इसके बाद, 1991 के आर्थिक सुधारों ने भारतीय अर्थव्यवस्था का चेहरा बदल दिया।
पी.वी. नरसिम्हा राव और मनमोहन सिंह की जोड़ी ने
देश को आर्थिक संकट से उबारा और निजी क्षेत्र के लिए नए रास्ते खोले ।
मनमोहन सिंह के
कार्यकाल में ‘नरेगा’ (MGNREGA) और ‘राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन’ जैसी फ्लैगशिप योजनाएं शुरू की गईं, जिन्होंने गरीबों की सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित की ।
| प्रधानमंत्री | प्रमुख योगदान/पहल | लक्षित समूह | प्रभाव |
| जवाहरलाल नेहरू | पंचवर्षीय योजनाएँ, IITs, सार्वजनिक क्षेत्र | युवा और औद्योगिक श्रमिक | आत्मनिर्भर भारत की नींव |
| लाल बहादुर शास्त्री | हरित क्रांति की शुरुआत | किसान (अन्नदाता) | खाद्य सुरक्षा की प्राप्ति |
| इंदिरा गांधी | गरीबी हटाओ, बैंकों का राष्ट्रीयकरण, 20-सूत्रीय कार्यक्रम | गरीब और भूमिहीन | सामाजिक न्याय का विस्तार |
| अटल बिहारी वाजपेयी | स्वर्णिम चतुर्भुज, सर्व शिक्षा अभियान | ग्रामीण जनता और छात्र | बुनियादी ढाँचे का विकास |
| डॉ. मनमोहन सिंह | आर्थिक उदारीकरण, MGNREGA | ग्रामीण मजदूर और उद्योग | सतत आर्थिक विकास |
वर्तमान में, भारत अपनी स्वतंत्रता के 100वें वर्ष, यानी 2047 तक एक ‘विकसित राष्ट्र’ बनने के लक्ष्य की ओर अग्रसर है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के
नेतृत्व में शासन का यह मॉडल “सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास” पर आधारित है। इस विजन के केंद्र में चार प्रमुख स्तंभ हैं, जिन्हें “जीवाईएएन” (GYAN) ढांचा कहा जाता है ।
1. गरीब (G – Garib): शून्य गरीबी का संकल्प
विकसित भारत 2047 का लक्ष्य है भारत से गरीबी का पूर्ण उन्मूलन। सरकार ने “नया कल्याणवाद” (New Welfarism) अपनाया है, जहाँ तकनीक के माध्यम से भ्रष्टाचार मुक्त लाभ वितरण सुनिश्चित किया जा रहा है ।
- प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (DBT): आधार और जन धन खातों के माध्यम से करोड़ों रुपये सीधे लाभार्थियों के खातों में भेजे जा रहे हैं, जिससे बिचौलियों की भूमिका समाप्त हो गई है ।
- बुनियादी सुविधाएं: प्रधानमंत्री आवास योजना, जल जीवन मिशन और सौभाग्य योजना के माध्यम से 100% संतृप्ति (Saturation) प्राप्त करने का लक्ष्य है, ताकि हर गरीब के पास पक्का घर, पानी और बिजली हो 20।
- स्वास्थ्य सुरक्षा: जन औषधि केंद्रों के माध्यम से दवाओं की कीमतों में 80-90% की कटौती की गई है, जिससे गरीबों के स्वास्थ्य खर्च में भारी कमी आई है ।
2. युवा (Y – Yuva): जनसांख्यिकीय लाभांश का लाभ उठाना
भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी युवा शक्ति है। विकसित भारत का विजन युवाओं को नवाचार और उद्यमशीलता का नेतृत्व करने के लिए तैयार करना है ।
- कौशल विकास: प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना और नई शिक्षा नीति (NEP) 2020 युवाओं को 21वीं सदी की जरूरतों के अनुरूप तैयार कर रही हैं ।
- अग्निपथ योजना: रक्षा क्षेत्र में युवाओं की भागीदारी और अनुशासन को बढ़ावा देने के लिए यह एक क्रांतिकारी कदम है ।
- नवाचार संस्कृति: प्रोफेसर रिपु रंजन सिन्हा के अनुसार, भारत की युवा आबादी को एक उत्पादक और नवाचारी कार्यबल में बदलना ही ‘ब्रेन ड्रेन’ को रोकने का एकमात्र तरीका है ।
3. अन्नदाता (A – Annadata): कृषि को आधुनिक बनाना
किसानों को केवल ‘अन्नदाता’ के रूप में नहीं, बल्कि एक उद्यमी के रूप में विकसित करना इस मिशन का मुख्य उद्देश्य है। भारत को दुनिया की “खाद्य टोकरी” (Food Basket) बनाने का लक्ष्य रखा गया है ।
- पीएम-किसान (PM-KISAN): अब तक 11 करोड़ किसानों को 2.80 लाख करोड़ रुपये से अधिक की सीधी वित्तीय सहायता प्रदान की गई है ।
- एग्री-टेक नवाचार: ड्रोन तकनीक, एआई (AI) और ब्लॉकचेन का उपयोग कृषि उत्पादकता बढ़ाने और आपूर्ति श्रृंखला में पारदर्शिता लाने के लिए किया जा रहा है । ‘नमो ड्रोन दीदी’ कार्यक्रम के तहत 15,000 ड्रोन महिलाओं के स्वयं सहायता समूहों को दिए जा रहे हैं ।
- मूल्य संवर्धन: एफपीओ (FPOs) के माध्यम से छोटे और सीमांत किसानों को बाजार तक बेहतर पहुंच और अपने उत्पादों का सही मूल्य दिलाने में मदद मिल रही है ।
4. नारी शक्ति (N – Nari Shakti): महिला-नेतृत्व वाला विकास
विकसित भारत का विजन महिलाओं के विकास से आगे बढ़कर “महिलाओं के नेतृत्व वाले विकास” की ओर बढ़ चुका है ।
- आर्थिक भागीदारी: 2047 तक महिलाओं की आर्थिक भागीदारी को 70% तक बढ़ाने का लक्ष्य है । मुद्रा योजना के तहत अधिकांश ऋण महिला उद्यमियों को दिए गए हैं 。
- सामाजिक सुरक्षा: उज्ज्वला योजना ने महिलाओं को धुएं से मुक्ति दिलाई है, जबकि स्वच्छ भारत मिशन के तहत बने शौचालयों ने उनकी गरिमा सुनिश्चित की है ।
- राजनीतिक प्रतिनिधित्व: महिला आरक्षण विधेयक जैसे ऐतिहासिक कदम महिलाओं को निर्णय लेने की प्रक्रियाओं में समान भागीदारी प्रदान कर रहे हैं ।
प्रोफेसर रिपु रंजन सिन्हा का दर्शन और ‘रेड ग्रीन मूवमेंट’
प्रोफेसर रिपु रंजन सिन्हा का कार्य और उनकी पुस्तकें, जैसे “ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया” (Transforming India), विकसित भारत के लक्ष्यों के साथ पूर्णतः संरेखित हैं । उनका “रेड ग्रीन मूवमेंट” (Red Green Movement) एक अनूठी अवधारणा है जो विज्ञान, तकनीक और नवाचार (Red) को सतत विकास, शांति और पर्यावरण स्थिरता (Green) के साथ जोड़ती है।
प्रोफेसर सिन्हा का तर्क है कि
नवाचार की संस्कृति के बिना कोई भी विकासशील देश ‘विकसित’ का दर्जा प्राप्त नहीं कर सकता । उनका “इनोवेट इंडिया” प्रोजेक्ट कौशल विकास, वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बढ़ावा देने और प्रतिभा पलायन को रोकने पर केंद्रित है। वह सूचना और संचार प्रौद्योगिकी (ICT) को विकसित भारत 2047 के लिए ‘डिजिटल उत्प्रेरक’ के रूप में देखते हैं ।
नवाचार के प्रति उनका दृष्टिकोण केवल तकनीक तक सीमित नहीं है, बल्कि वह इसे मानवीय मूल्यों और आध्यात्मिक ज्ञान के साथ जोड़ने की बात करते हैं। वह मानते हैं कि जब तक समाज का हर व्यक्ति—चाहे वह किसान हो, युवा हो या महिला—नवाचार को अपनी जीवनशैली का हिस्सा नहीं बनाता, तब तक 30 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था का सपना पूरा नहीं होगा।
चुनौतियां और भविष्य की राह (Way Forward)
यद्यपि भारत ने विकास के पथ पर लंबी छलांग लगाई है, लेकिन विकसित भारत 2047 के मार्ग में कुछ महत्वपूर्ण चुनौतियां अब भी बनी हुई हैं।
प्रमुख चुनौतियां
- सामाजिक मानदंड और लैंगिक पूर्वाग्रह: ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं की शिक्षा और कार्य में भागीदारी के खिलाफ पारंपरिक सामाजिक बाधाएं अब भी मौजूद हैं ।
- बेरोजगारी: विशेष रूप से शिक्षित युवाओं में बेरोजगारी की दर को कम करना और उनके लिए विनिर्माण क्षेत्र में उत्पादक नौकरियां पैदा करना एक बड़ी चुनौती है ।
- कृषि में अनिश्चितता: जलवायु परिवर्तन, बेमौसम बारिश और कीटों के हमले किसानों की आय को अस्थिर बनाते हैं, जिससे कृषि क्षेत्र में जोखिम बढ़ जाता है ।
- संस्थागत सुधार: एक उच्च-आय वाला देश बनने के लिए भारत को अपनी न्यायिक और प्रशासनिक प्रणालियों की गुणवत्ता में और अधिक सुधार करने की आवश्यकता है ।
रणनीतिक समाधान और भविष्य का रोडमैप
- कौशल विकास और शिक्षा: कौशल विकास केंद्रों का विस्तार और व्यावसायिक शिक्षा को मुख्यधारा में लाना युवाओं को वैश्विक रोजगार बाजार के लिए तैयार करेगा ।
- कृषि-आधारित उद्योग: ग्रामीण क्षेत्रों में कटाई के बाद के बुनियादी ढांचे (Cold Storage, Processing Units) का विकास किसानों की आय दोगुनी करने में सहायक होगा ।
- डिजिटल समावेशन: 5G और 6G जैसी तकनीकों को दूरदराज के गांवों तक पहुंचाना ताकि शासन की पारदर्शिता और सेवाओं की पहुंच 100% बनी रहे ।
- सतत विकास: हरित हाइड्रोजन मिशन और नवीकरणीय ऊर्जा के स्रोतों का विस्तार भारत को नेट-जीरो कार्बन उत्सर्जन के लक्ष्य की ओर ले जाएगा ।
1947 से पहले के सामंती पतन से लेकर 2047 के विकसित भारत के विजन तक की यात्रा भारतीय मानस की अदम्य इच्छाशक्ति का प्रतीक है। पूर्व-स्वतंत्रता के शासकों और कूटनीतिज्ञों की विफलता ने हमें सिखाया कि बिना जनता की भागीदारी और कल्याण के शासन टिक नहीं सकता। स्वतंत्रता के बाद के विभिन्न प्रधानमंत्रियों ने संस्थानों और नीतियों के माध्यम से उस नींव को मजबूत किया।
आज, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में और प्रोफेसर रिपु रंजन सिन्हा जैसे दूरदर्शी विचारकों के मार्गदर्शन में, भारत अपनी आंतरिक शक्ति—जीवाईएएन (GYAN)—को पहचान चुका है।
गरीब का उत्थान, युवा का कौशल, किसान की समृद्धि और नारी की शक्ति ही वह ईंधन है जो भारत के विकास के रथ को 2047 की मंजिल तक ले जाएगा। यह केवल एक आर्थिक लक्ष्य नहीं है, बल्कि यह 1.4 अरब भारतीयों के आत्म-सम्मान, गरिमा और एक न्यायपूर्ण समाज के निर्माण का महायज्ञ है। जैसा कि प्रोफेसर सिन्हा कहते हैं, “नवाचार ही परिवर्तन का इंजन है,” और भारत का हर नागरिक आज उस इंजन का हिस्सा बनकर एक नए गौरवशाली भविष्य की पटकथा लिख रहा है।
विकसित भारत 2047 का सपना अब केवल एक आकांक्षा नहीं, बल्कि एक सुनियोजित और साध्य वास्तविकता है। कूटनीति, शासन और जन प्रबंधन के इस नए युग में भारत न केवल अपनी समस्याओं का समाधान कर रहा है, बल्कि विश्व के लिए “विश्व मित्र” और “विकास के मॉडल” के रूप में उभर रहा है। ‘अमृत काल’ का यह समय हमारे सामूहिक प्रयासों से भारत को पुनः ‘विश्व गुरु’ के पद पर प्रतिष्ठित करने का स्वर्णिम अवसर है।




